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दिहाड़ी मजदूर की दो बेटियों ने नीट में लहराया सफलता का परचम, पिता के संघर्ष और बेटियों की मेहनत ने लिखी प्रेरणा की नई कहानी

दिहाड़ी मजदूर की दो बेटियों ने नीट में लहराया सफलता का परचम, पिता के संघर्ष और बेटियों की मेहनत ने लिखी प्रेरणा की नई कहानी

आईरा इकबाल खान,बीकानेर। कहते हैं कि अगर इरादे मजबूत हों तो आर्थिक तंगी भी सपनों की राह नहीं रोक सकती। इस कहावत को सच कर दिखाया है कारीगरी का काम करने वाले दिहाड़ी मजदूर मोहम्मद आमीन कुरैशी और उनके परिवार ने। रोजाना मेहनत-मजदूरी कर लगभग 700 से 800 रुपये कमाने वाले मोहम्मद आमीन ने सीमित आय के बावजूद अपने बच्चों की शिक्षा से कभी समझौता नहीं किया। उनका सपना था कि उनके बच्चे उच्च शिक्षा प्राप्त कर समाज में अपनी अलग पहचान बनाएं।

इस सपने को साकार करने की दिशा में सबसे पहले उनकी बड़ी बेटी रोजा सुलेमानी ने कई असफलताओं के बावजूद हार नहीं मानी। लगातार तीन प्रयासों के बाद उसने नीट परीक्षा उत्तीर्ण की और आज करौली के सरकारी मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस तृतीय वर्ष की पढ़ाई कर रही है।

बड़ी बेटी की सफलता से प्रेरित होकर छोटी बेटी आफरीन सुलेमानी ने भी कड़ी मेहनत की और इस वर्ष नीट परीक्षा में सफलता हासिल कर परिवार का गौरव बढ़ाया। एक ही परिवार की दो बेटियों का मेडिकल क्षेत्र में चयन पूरे इलाके के लिए गर्व का विषय बन गया है।

मोहम्मद आमीन का सपना यहीं नहीं रुका है। अब वह अपने बेटे को भी नीट परीक्षा की तैयारी करवा रहे हैं। परिवार का कहना है कि बेटा पढ़ाई में मेधावी है और लगातार अच्छे अंक प्राप्त कर रहा है। उन्हें विश्वास है कि वह भी आने वाले समय में सफलता हासिल करेगा। इस प्रेरणादायक यात्रा में फारूक सर, साजिद सुलेमानी कुरैशी, जावेद सिद्दीकी, मोहम्मद अयूब (होटल व्यवसायी) तथा रहमत अली (ठेकेदार) सहित कई लोगों ने मार्गदर्शन और सहयोग देकर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उल्लेखनीय है कि इस वर्ष मोहल्ला व्यापरियां से दो अन्य विद्यार्थियों ने भी नीट परीक्षा में सफलता प्राप्त की है। लगातार मिल रही इन उपलब्धियों से पूरे क्षेत्र में खुशी और उत्साह का माहौल है।

यह कहानी उन माता पिता और युवाओं के लिए भी एक संदेश है, जो अपना समय और पैसा गलत आदतों में बर्बाद कर देते हैं। जो बच्चे होटलों, फुटपाथों और थड़ियों पर बैठकर गुटखा, तंबाकू नशे जैसी आदतों में समय गंवाते हैं, उधार लेकर किश्तों की मोटरसाइकिल में तेल भरवाते हैं और गलियों में तेज रफ्तार से बाइक दौड़ाकर अपनी और दूसरों की जान जोखिम में डालते हैं, उन्हें एक बार मोहम्मद आमीन कुरैशी और उनके बच्चों से प्रेरणा लेनी चाहिए।

सोचिए, सीमित आय वाला एक दिहाड़ी मजदूर यदि अपने बच्चों को डॉक्टर बनाने का सपना पूरा करने के लिए हर संभव प्रयास कर सकता है, तो क्या हम और हमारे बच्चे भी शिक्षा, मेहनत और अपने भविष्य पर उतना ही ध्यान नहीं दे सकते? सफलता दिखावे, शौक या फिजूलखर्ची से नहीं, बल्कि मेहनत, अनुशासन और पढ़ाई के प्रति समर्पण से मिलती है।

मोहम्मद आमीन कुरैशी और उनकी बेटियों की यह सफलता केवल एक परिवार की उपलब्धि नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरणा है कि हालात चाहे जैसे भी हों, यदि इरादे मजबूत हों तो मंजिल जरूर मिलती है।

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