गैस संकट का बढ़ता असर रसोई से अस्पताल और उद्योग तक, महंगाई की मार झेलेगा आम आदमी
आईरा समाचार इकबाल खान बीकानेर
वैश्विक गैस संकट को केवल एलपीजी संकट समझना अधूरा होगा। भारत में प्राकृतिक गैस, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, कार्बन डाइऑक्साइड, आर्गन, हाइड्रोजन और खास तौर पर हीलियम जैसी गैसें कई जरूरी सेवाओं और उद्योगों की रीढ़ हैं। संकट की स्थिति में इसका असर पहले कीमतों पर, फिर उपलब्धता पर और अंततः आम आदमी के जीवन पर महंगाई, सेवाओं में देरी और जीवन-रक्षा प्रणालियों पर दबाव के रूप में दिखाई देता है।
परिवहन और रोजमर्रा की आवाजाही
ट्रांसपोर्ट सेक्टर में सीएनजी का व्यापक उपयोग हो रहा है—ऑटो, टैक्सी, बसों से लेकर निजी वाहनों तक। आपूर्ति प्रभावित होने पर किराए बढ़ सकते हैं, डिलीवरी और लॉजिस्टिक्स महंगे हो सकते हैं, जिससे सब्जी, दूध और रोजमर्रा के सामान के दाम बढ़ना तय है।
बिजली उत्पादन और ऊर्जा सुरक्षा
प्राकृतिक गैस आधारित पावर प्लांट देश की ऊर्जा जरूरतों में अहम भूमिका निभाते हैं। गैस महंगी या कम हुई तो बिजली उत्पादन लागत बढ़ेगी, जिससे पावर कट या लोड मैनेजमेंट का दबाव बढ़ सकता है। इसका असर उद्योगों और आम उपभोक्ताओं दोनों पर पड़ेगा।
उर्वरक और खेती पर असर
यूरिया और अन्य उर्वरकों के उत्पादन में प्राकृतिक गैस का बड़ा योगदान है। गैस महंगी होने से उत्पादन लागत बढ़ेगी और आपूर्ति प्रभावित हो सकती है, जिससे किसानों की लागत बढ़ेगी और खाद्यान्न महंगाई का खतरा बढ़ेगा।
अस्पताल और स्वास्थ्य सेवाएं
ऑक्सीजन, नाइट्रोजन और हीलियम जैसी गैसें अस्पतालों के लिए बेहद जरूरी हैं। ऑक्सीजन की कमी सीधे जीवन-रक्षा सेवाओं को प्रभावित कर सकती है। हीलियम महंगा होने पर एमआरआई जैसी जांचें महंगी हो सकती हैं, जिससे मरीजों पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।
स्टील और निर्माण उद्योग
ऑक्सीजन, नाइट्रोजन और एलपीजी का उपयोग वेल्डिंग, कटिंग और मेटल प्रोसेसिंग में होता है। गैस महंगी होने पर निर्माण लागत बढ़ेगी, जिससे मशीनरी, ऑटो पार्ट्स और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट प्रभावित होंगे।
फूड प्रोसेसिंग और कोल्ड-चेन
पैकेज्ड फूड और पेय पदार्थों में नाइट्रोजन और कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग होता है। संकट बढ़ने पर इन उत्पादों की कीमतें बढ़ सकती हैं और उपलब्धता कम हो सकती है।
रिफाइनरी और केमिकल उद्योग
हाइड्रोजन, प्राकृतिक गैस और नाइट्रोजन रिफाइनिंग और केमिकल प्रोसेस में जरूरी हैं। आपूर्ति बाधित होने पर ईंधन, प्लास्टिक, पेंट और डिटर्जेंट जैसे उत्पाद महंगे हो सकते हैं।
इलेक्ट्रॉनिक्स और हाई-टेक सेक्टर
सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग में हीलियम और नाइट्रोजन की बड़ी भूमिका है। संकट बढ़ने पर मोबाइल, कंप्यूटर और अन्य उपकरणों की कीमतों में बढ़ोतरी हो सकती है।
घरेलू रसोई और छोटे व्यवसाय
एलपीजी और पीएनजी की कीमतों में बढ़ोतरी से घरेलू बजट पर सीधा असर पड़ेगा। होटल, ढाबे और छोटे फूड कारोबार भी प्रभावित होंगे, जिससे खाने-पीने की चीजें महंगी हो सकती हैं। कुल मिलाकर, गैस संकट केवल ऊर्जा का नहीं बल्कि पूरे आर्थिक और सामाजिक ढांचे को प्रभावित करने वाला संकट बनता जा रहा है, जिसका असर धीरे-धीरे हर घर तक पहुंच सकता है।

