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बीकानेर जिले में नेताओं के महाभारत में कांग्रेस पार्टी का चीर हरण

बीकानेर जिले में नेताओं के महाभारत में कांग्रेस पार्टी का चीर हरण कहते हैं ना जंग, मुहब्बत और राजनीति में सब जायज़ होता है!

आईरा समाचार इकबाल खान, बीकानेर जिले की कांग्रेस पार्टी के नेताओं के बीच हालात किसी बड़े युद्ध जैसे बनते नजर आ रहे हैं। अमेरिका-इजराइल बनाम ईरान जैसे टकराव की तुलना यहां की अंदरूनी सियासत से की जा रही है। कांग्रेस पार्टी के प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर के कई नेता मूक दर्शक बने हुए हैं और पार्टी की आबरू सरेआम दांव पर लगती दिखाई दे रही है। दिनांक 25 मार्च को ककराला गांव में एक घर में चल रहे जागरण कार्यक्रम में कांग्रेस पार्टी के नेता एवं पूर्व मंत्री श्री गोविन्द राम चौहान भी शामिल हुए। बताया जाता है कि एक कमरे में लोकसभा चुनाव को लेकर कुछ चर्चा शुरू हुई। कहा जाता है कि गांव के ही किसी व्यक्ति ने उस बातचीत की ऑडियो/वीडियो रिकॉर्ड कर उसे एडिट करके सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया।
इस ऑडियो में दिवंगत जाट नेता रामेश्वर डूडी की भाजपा से कथित मिलीभगत और देहात व शहर कांग्रेस अध्यक्षों के बारे में उल्टी-सीधी टिप्पणियां होने की बात सामने आई।
दिनांक 1 अप्रैल को यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष भंवर कूकना के नेतृत्व में गांधी मैदान में डूडी समर्थकों की भीड़ एकत्रित हुई। इसके बाद जुलूस के रूप में कलेक्ट्रेट परिसर पहुंचकर पुलिस प्रशासन से विवादित ऑडियो की जांच की मांग की गई कि क्या इसमें छेड़छाड़ (टेम्परिंग) की गई है।
कुछ लोगों द्वारा पूर्व मंत्री गोविन्द राम चौहान को कांग्रेस पार्टी से निष्कासित करने की मांग भी कांग्रेस आलाकमान से की गई।क्रिया की प्रतिक्रिया के तहत पूर्व मंत्री गोविन्द राम चौहान ने 5 अप्रैल को बीकानेर संसदीय क्षेत्र के अपने समर्थकों को गांधी मैदान में बुलाया और जुलूस के साथ कर्मचारी मैदान में सार्वजनिक सभा आयोजित की। ये तमाम राजनीतिक घटनाक्रम प्रदेश कांग्रेस की जानकारी में होते रहे।
राजनीति के हमाम में अधिकतर लोग बेनकाब हो जाते हैं। जिन बातों पर पर्दा रहना चाहिए था, उन्हें भी सार्वजनिक कर दिया गया। कांग्रेस के मरहूम नेता रामेश्वर डूडी पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने पार्टी के साथ भीतरघात किया और भाजपा से सांठगांठ रखी। यह भी आरोप लगाया गया कि 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में अर्जुन राम को लाभ पहुंचाने के लिए कांग्रेस प्रत्याशियों शंकर पन्नू और मदन गोपाल मेघवाल को हराने का काम किया गया।
मंच से यह भी कहा गया कि 2003 के नोखा विधानसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी रेवन्त राम पंवार को हराने के लिए भाजपा प्रत्याशी गोविन्द राम चौहान को समर्थन दिलवाया गया, जिसके चलते उन्हें 27,000 से अधिक वोटों से जीत मिली। कहावत है, “मूर्ख दोस्त से समझदार दुश्मन बेहतर होता है।इन आरोपों पर जिला प्रमुख मोडा राम मेघवाल ने भी बयान देकर मानो मुहर लगा दी। एक पत्रकार को दिए गए बयान में उन्होंने कहा कि 2003 के चुनाव में रामेश्वर डूडी के समर्थन से ही गोविन्द राम चौहान को बड़ी जीत मिली थी।
शहर अध्यक्ष मदन गोपाल मेघवाल पर भी अपने मौसेरे भाई अर्जुन राम का साथ देने का आरोप लगाया गया।
देहात कांग्रेस अध्यक्ष बिशना राम सियाग पर 200 करोड़ रुपये के सोलर पावर प्लांट में भाजपा नेताओं के साथ साझेदारी का आरोप लगाया गया।मंच से यह भी आरोप लगाया गया कि लूणकरणसर के पूर्व विधायक वीरेन्द्र बेनीवाल और डूंगरगढ़ के पूर्व विधायक मंगला राम गोदारा को भी डूडी समूह द्वारा हरवाया गया, जिनका अब तक सार्वजनिक रूप से खंडन नहीं हुआ है।दूसरी ओर वीरेन्द्र बेनीवाल का एक बयान भी चर्चा में रहा, जिसमें उन्होंने कहा”बिल्ली को दूध की रखवाली करने का काम दे दिया गया है।” हालांकि इसमें किसकी ओर इशारा था, यह स्पष्ट नहीं है।
उधर राजेन्द्र मूंड का बयान भी सामने आया, जिसमें उन्होंने कहा कि पीठ पीछे कम्बल के सहारे वार करना सहन नहीं किया जाएगा।शहर के कांग्रेसी नेता भी इस विवाद से अछूते नहीं रहे। देहात कांग्रेस अध्यक्ष बिशना राम सियाग और शहर अध्यक्ष मदन गोपाल मेघवाल ने 5 अप्रैल की सभा से दो दिन पहले एक पत्र जारी कर स्पष्ट किया था कि इस कार्यक्रम का कांग्रेस पार्टी से कोई संबंध नहीं है।इसके बावजूद बड़ी संख्या में कांग्रेस नेता और कार्यकर्ता इन निर्देशों की अनदेखी करते हुए जुलूस के रूप में सभा में पहुंचे और अपनी छातियों पर अशोक गहलोत के पोस्टर लगाकर भागीदारी की।
यहां तक कि महिला कांग्रेस की कार्यकर्ताओं ने भी नाचगाकर मंच पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।जनता के बीच यह चर्चा भी रही कि क्या अशोक गहलोत का इस पूरे घटनाक्रम को मौन समर्थन प्राप्त है।सभा में यदि कुछ तथ्यों और सवालों पर भी स्पष्टता आती, तो आमजन को स्थिति बेहतर समझ में आती। सवाल यह भी उठ रहा है कि 2023 के विधानसभा चुनाव में बीकानेर पूर्व सीट से कन्हैया लाल झवर की जगह यशपाल गहलोत को टिकट क्यों दिया गया? क्या किसी आंतरिक सर्वे में झवर को कमजोर पाया गया था।इसी तरह, जब पूर्व मंत्री वीरेन्द्र बेनीवाल ने निर्दलीय चुनाव लड़ने की घोषणा की थी, तब क्या अशोक गहलोत ने उन्हें मनाने का प्रयास किया था। चुनाव हारने के बाद बेनीवाल को छह साल के लिए निष्कासित किया गया और बाद में फिर से पार्टी में शामिल कर लिया गया क्या यह बदलते समीकरणों का संकेत है।कोलायत में रेवन्त राम पंवार का पहले आरएलपी से चुनाव लड़ना और बाद में कांग्रेस में शामिल होना क्या यह संगठन को मजबूत करने की रणनीति है। डूंगरगढ़ में मंगला राम गोदारा और रेवन्त राम माहिया को लेकर भी इसी तरह के सवाल उठ रहे हैं। हकीकत यह है कि चाहे प्रदेश स्तर हो या बीकानेर जिला, कई नेता उसी पेड़ को काटने में लगे हैं जो उन्हें फल और छाया देता है।

फकत
मोहब्बत अली तंवर
एडवोकेट
आम अवाम
बीकानेर।

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