पर्दा एवं हिजाब सभ्यता, सुरक्षा और सम्मान का शाश्वत दर्शन
आईरा समाचार लेखक डॉ. मोहम्मद यूनुस कुरैशी
आज के दौर में पर्दा और हिजाब को लेकर उठने वाले विवादों के बीच, डॉ. मोहम्मद यूनुस कुरैशी का यह विचारोत्तेजक लेख हमें गहराई से सोचने पर मजबूर करता है। पर्दा केवल एक कपड़े का टुकड़ा नहीं, बल्कि मानव सभ्यता का मूल दर्शन है सम्मान, मर्यादा, सुरक्षा और संतुलन का प्रतीक। क्या पर्दा बंधन है या रक्षा? आइए, इस लेख के मुख्य बिंदुओं पर नजर डालें।जो चीज़ जितनी कीमती होती है, उसे उतना ही संभालकर रखा जाता है।” हीरा तिजोरी में, सोना बंद बक्से में यही सिद्धांत नारी सम्मान पर भी लागू होता है। भारतीय सभ्यता में ग्रामीण महिलाओं की ओढ़नी, पुरुषों का साफा या पगड़ी ये सभी पर्दे के रूप हैं, जो आत्मसम्मान और सांस्कृतिक पहचान को दर्शाते हैं। जब कोई बुजुर्ग आता है और महिला खुद को ढक लेती है, तो यह आदर का भाव है, न कि दबाव।हर धर्म में पर्दा मौजूद है: मंदिरों में देवी-देवताओं को वस्त्रों से ढकना, मस्जिदों में हिजाब का सिद्धांत, गुरुद्वारों में सिर ढकना, चर्चों में मर्यादित वस्त्र। यह पवित्रता और आत्मसंयम सिखाता है। हिजाब महिला का मौलिक अधिकार है उसकी पसंद, उसकी पहचान। वास्तविक आजादी विकल्पों में है, न कि एक ही जीवनशैली थोपने में।आधुनिक जीवन में भी पर्दा हर जगह है: हेलमेट सिर की सुरक्षा, मास्क चेहरे का, घर के पर्दे निजता के। हवाई जहाज बंद होते हैं सुरक्षा के लिए, बॉर्डर फेंसिंग राष्ट्र की रक्षा के लिए। पश्चिम में भी गोपनीयता कानून और ड्रेस कोड पर्दे ही हैं। इतिहास की नारियां जैसे रानी लक्ष्मीबाई या सावित्रीबाई फुले ने मर्यादा में रहकर इतिहास रचा।निष्कर्ष में, पर्दा सुरक्षा है, समझदारी है, संतुलन है। हिजाब शान है, मर्यादा पहचान। सभ्यता बनी रहेगी, तो पर्दा भी रहेगा।

